ओ रे मनवा तू तो बावरा है तथा दिल तो बच्चा है जी ।
ओ रे मनवा तू तो बावरा है तथा
दिल तो बच्चा है जी ।☺️☺️☺️🌟⭐💫
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एक डॉक्टर की जिंदगी में रुग्णसेवा करते हुए विविध cases सामने आते है, उसमे से कुछ cases ऐसे होते है जहा मेडिकल science में भी कही बार उसके उत्तर देना नामुमकीन होता है।
कुछ चीजों के उत्तर नही रहते वह बस हो जाती है और हमे खास कर डॉक्टरों को चकनाकर रख देती है।
ऐसी ये कहानी बड़ी रोमांच खडी करने वाली...
जरा गौर से सुनिए।👉👉
🌟🌟
२०१९ के नवंबर महीने की बात , विश्वकिरण चिकित्सालय को स्थापन हुए बस २ ही महीने हुए थे।
तभी अचानक डॉ ऋतुजा हो एक फोन आता है, समाने से एक महिला बड़े ही दर्द में अपने पेशेंट के केस के बारे में बताने लग जाती है, केस की शुरवात ही कुछ इस प्रकार होती है..
📞"डॉ, माँ को lung cancer है और बस इतना ही नई कुछ और टेस्ट के बाद यह मालूम हुआ कि वह कैंसर शरीर में अनेक मुख्य स्थानों पर फेल चुका है, lung के साथ ही किडनी, ब्रेन,एड्रिनल ग्लैंड।
इसके साथ ही शारीरीक लक्षणों में भूख बिलकुल नहीं लगना, लॉस ऑफ टेस्ट, निंद नही आना, chest heavyness, बार बार मुंह में बलगम आना, अनिद्रा, भयंकर weakness, weightloss ये सारे लक्षणों का समूह तथा इतनी critical case और पेशेंट बड़े ही आशावादी होकर क्लिनिक में आए थे।
पूर्ववत शुरू हुए चिकित्सा से शरीर में कोई बदलाव दिखाई नही दे रहा था तथा कैंसर के metastis स्टेज के वजेसे पेशेंट की जान को बोहोत ज्यादा खतरा साफ साफ था।🔴🔴
बड़े दर्द भरे शब्द और भरी हुई आंखे से जब पेशेंट की दोनो बिटिया जब क्लिनिक में आई तब उनको हौसला देते हुए , पेशंट के बारे में और उनकी शरीर में स्थित परिस्थिति के बारे में उनको बताया दिया गया और हम पेशेंट के लिए हमारी तरफ से पूरी कोशिश करेंगे और उनको तुरंत आयुर्वेदिक ट्रिटमेंट स्टार्ट कर देंगे ऐसा डॉ ऋतुजा इन्होने बताया ।
पेशेंट की परिस्थिति देखते हुए उन्हें औषधी देना भी बोहोत कठिन कार्य था , जहा पेशेंट पानी के अलावा कई दिनों से कुछ भी सेवन कर नही रहा था तब उन्हे काढ़े, चूर्ण गोलियां देना बोहोत ही कठिन कार्य था लेकिन भगवान धन्वंतरी, गुरुजन और आयुर्वेद शास्त्र को प्रणाम करते हुए बड़ी मेहनत से combination बनाकर तथा बाह्य चिकित्सा में लेप, तेल का उपयोग करते हुए चिकित्सा शुरू हुई।
यहां तक तो बस picture का ट्रेलर था कहानी तो अभी शुरू होने वाली है।
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पेशंट की चिकित्सा शुरू करने के बाद बस २ दिन में पेशट के रिलेटिव का फोन आया । फोन देखकर dr ऋतुजा इनके मन में अनेक प्रश्न निर्माण हुए, कही पेशंट को कुछ तकलीफ तो हुई नही होगी ना? पेशेंट को औषधी लेते हुए कुछ कष्ट तो नही हुआ होगा ना?
ऐसे मन में अनेक विचार के साथ फोन उठाया तो सामने से पेशंट की बेटी जो दो दिन पहले क्लिनिक में आसू बहा रही थी वह इतनी खुशी से हसकर बोली
"डॉ!!! माँ ने आज हमारे पास कॉफी मांगी बड़े मेहनो के बाद उसने बोहोत जिद से कुछ खाने को मांगा क्या करू डॉक्टर उसे दे दूं?"
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कुछ देर तो डॉ Rutuja को सामने से क्या बोल रहे ये समझने में लगा और यही भगवान धन्वंतरी की कृपा है जो पेशंट को जीने के लिए नई उम्मीद दे रही है इसका एहसास हुआ।🙏✨💫
और उनसे कहा गया "माँ जो भी मांग रही है उसे दे दो अगर कुछ तकलीफ हो तो मैं हू ही"
ऐसे कहते ही पेशेंट के relative फूले न समाए ।
✨💫✨💫🌟✨💫🌟💫
जिस पेशंट को १ महीने का कालावधी बोला था वह खाना खाने लगी और १ महीने की कालावधी से लेकर वह आगे ९ महीने बोहोत अच्छे condition में रही।
उनके देहांत के कुछ दिन पहले dr ऋतुजा उन्हे होम विजिट के लिए गई तब पेशेंट का अंतिम शब्द ये थे
"डॉक्टर, बेटा तुम्हारे दवाई से मैं फिरसे खाना खाने लगी मुझे जीने को उम्मीद मिली, मेरा आशिर्वाद सदैव तुम्हारे साथ है"।
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कहानी का तात्पर्य यह है की दवाई से पेशेंट के मन के ऊपर बोहोत परिणाम हुआ, खाना खाने की इच्छा , जिंदगी को नई उम्मीद मिलना ये सारी बाते मन के ऊपर स्थित है।
कोई भी व्याधि पहले मन को जखड़ता है और फिर शरीर को इस केस में भी मन का कार्य बोहोत ही महत्वपूर्ण था।
पेशेंट ने कॉफी से शुरू करते हुए पानीपुरी तक की खाने की इच्छा और जिद रखी इसलिए कहते है न...
कितने भी परिस्थिति हो ,मन के आगे कुछ नहीं।
"दिल तो बच्चा है जी"....✨💫
"ओ रे मनवा तू तो बावरा है".....✨💫
Yours,
Dr.Rutuja Vijay Velaskar
@vishwakiran.ayurveda
Ayurvedacharya,Nadi Tadnya

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